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Apr 02, 2025
सुशील शुक्ल

सुशील शुक्ल

नया उभरता वोट बैंक हैं महिलाएं

देश की सभी राजनीतिक पार्टियों को अब इस बात का एहसास हो चुका है कि सत्ता की चाबी केवल पुरूषों की जेब में ही नहीं हैं, महिलाएं भी उसे अपने आंचल से बांधकर रखती हैं। महिलाएं एक कारगर वोट बैंक बन चुकी हैं।

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हमारे राजनीतिक दलों ने सत्ता पाने के अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए समाज को संप्रदाय और जाति के आधार पर बांटने और उनके बीच अपना-अपना वोट बैंक तैयार करने के लिए जमीन-आसमान के कुलावे मिलाए हैं। इस कवायद के बीच, चाहे अनजाने ही, उन्होंगे एक और अलग वोट बैंक तैयार कर दिया है जो संप्रदाय और जाति से परे हैं और इतना शक्तिशाली हैं कि चुनावी पंडितों की अवधारणाओं और चुनावी नतीजों को प्रभावित करने वाली प्रचलित मान्यताओं को चुनौती देने की क्षमता रखता हैं। यह वोट बैंक ‘लहरों‘ की दिशा पलटने में भी कामयाब देखा गया हैं। चुनावी शोशेबाजी के शोर में चुप्पी साधे रखने वाला यह वोट बैंक मतदान केन्द्र के भीटर पहुंचते ही अपने वोट के जारिए मुखर हो उठता हैं और तमाम धारणाओं को ध्वस्त कर देता हैं।
यह वोट बैंक देश की आधी आबादी यानि महिलाओं का वोट बैंक हैं, भले ही उसे वोट बैंक के रूप में अभी तक पहुंचाना न गया हो या मान्यता न दी गई हों। सच्चाई यह हैं कि प्रायः सभी राजनीति दलों ने इस वोट बैंक का अपने-अपने तरीेके से इस्तेमाल किया हैं और इस वोट बैंक ने उनकी नैचा को पार भी लगाया हैं। महिला सशक्तिकरण अथवा कल्याणकारी योजनाओं के तहत इस वोट बैंक को साधने की कोशिश में को भी पीछे नहीं रहना चाहता। इसका प्रत्यक्ष लाभ भी उन्हें मिलता रहा हैं।
महिला वोट बैंक को गढ़ने की शुरूआत करने का श्रेय तमिलनाडू की पूर्व मुख्यमंत्री और रजतपट से निकलकर राजनीति पटल पर धाक जमाने वाली जयललिता जयराम को दिया जा सकता हैं। अपनी कल्याणकारी योजनाओं के बूते तमिलनाडू की जनता की प्यारी ‘अम्मा’ बन जाने वाली जयललिता ने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूट 2001 में सत्ता में जोरदार वापसी महिलाओं में वोटों के जरिए ही की थी। यह अलग बात है कि कानूनी हस्तक्षेप के चलते वह अधिक दिनों तक सत्तासीन नहीं रह सकी थीं।
महिलाओं में वोटों के जरिए ही की थी। यह अलग बात है कि कानूनी हस्तक्षेप के चलते वह अधिक दिनों तक सत्तासीन नहीं रह सकी थीं।
जयललिता ने जो रास्ता दिखाया उसे बाद में दूसरों ने भी अपनाया और अभी तक अपनाते आ रहें हैं। लम्बे अरसे से बिहार की राजनीति की धुरी बने हुए नीतीश कुमार ने सूबे में शराबबंदी के जारिए महिलाओं को अपने पाले में खीचनें की कामयाब कोशिश की। इसके अलावा उन्होंने बिहार में दर्जा नौ में पढ़ने वाली सभी बालिकाओं को मुफ्त साइकिल की सौगात भी दी जिसने छात्राओं, खासकर ग्रामीण छात्राआंे के लिए अपने घर से दूर स्थित विद्यालयों तक पहुंचकर उच्चतर शिक्षा प्राप्त करने का अवसर सुलभ करा दिया। इससे बिहार में सामाजिक बदलाव आना शुरू हुआ। महिलाओं को घर-गांव की चाहारदीवारी और बंदिशों से मुक्ति मिली और उनका आत्मविश्वास बढ़ा। उनके अरमानों को पंख लगें। घर के बाहर की कामकाजी दुनिया में उनकी भागीदारी बढ़ी हैं।
चलिए, इन पुरानी बातों को छोड़ते हैं और महिला वोट बैंक के दबदबे के कुछ ताजा उदाहरणों पर नजर डालने हैं। अभी-अभी हुए झारखंड और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों को देखें। झारखंड में भाजपा ने घुसपैठियों का मुद्दा उछालकर झारखंड मुक्ति मोर्चा को पछाड़ने की भरसक कोशिश की । लेकिन हेमंत सोरेन और उनकी पार्टी सत्ता पर काबिज बने रहने में कामयाब रहें। जेएमएम की मइयां सम्मान योजना की घोषणा ने अपना असर दिखाया और महिला मतदाता सोरेन के पक्ष में लाभबंद हो गयी। महिला वोट बैंक की ताकत महाराष्ट्र में भी दिखी। एकनाथ शिन्दे​ सरकार की लाड़ली बहिण योजना काम कर गई और एनडीए धमाकेदार ढंग से सत्ता बचाने में सफल रहा।
इसके पहले हरियाणा विधानसभा चुनाव में क्या हुआ? माना जा रहा था कि वहां जबरदस्त सत्ता विरोधी लहर हैं और कांग्रेस का बहुमत पाना तय हैं। मगर हुआ क्या? एंटी इन्कबेंसी वाली हवा फुस्स हो गयी और भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता पाने में सफल रही। माना जा सकता है कि वहां भी भाजपा ने अपने संकल्प-पत्र में महिलाओं से जो वायदे किए उन्होंने पूरी फिजां बदल दी। लाडली लक्ष्मी योजना के जरिए महिलाओं को हर महीने 2100 रुपये देने का वायदा किया गया तो हर घर गृहणी योजना में पांच सौ रूपये मंे रसोई गैस सिलेण्डर देने की बात कही गयी काॅलेज जाने वाली प्रत्येक ग्रामीण छात्रा को स्कूटी उपलब्ध करवाने का आश्वासन भी भाजपा ने दिया। भले ही ये वायदे थे मगर महिलाओ को लाभबंद करने में कारगर साबित हुए और सत्ता की चाबी फिर से भाजपा के हाथ लग गयी।
याद कीजिए यह ‘लाड़ली‘ वाला प्रयोग पिछले साल मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और अब मोदी मंत्रिमंडल के सदस्य शिवराज सिंह चैहान ने किया था। तब वहाॅ भी माना जा रहा था कि ‘एंटी इन्कंबेसी‘ भावनाएं प्रबल हैं और कांग्रेस के लिए बहुत अनुकूल माहौल हैं। शिवराज सिंह का नेतृत्व दांव पर लगा था। उन्होंने एक जबरदस्त रणनीतिक पासा फेंका और मुख्यमंत्री लाड़ली बहना योजना लागू कर दी जिसके तहद महिलाओं को उनके स्वास्थ्य व पोषण तथा आर्थिक स्वावलंबन के लिए हर महीने 1250 रुपये दिए जाने लगे। मामा का यह दांव बहनों पर काम कर गया और वह तीसरी बार चुनाव जीत गए। भले ही उन्हें मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी न देकर पार्टी नेतृत्व ने केन्द्र में मंत्री बना दिया, मगर चुनाव जीतने का उनका ‘लाड़ली‘ वाला टोटका चल निकाला।
ऐसा भी नही हैं कि महिला वोट बैंक को साधने की कोशिश कांग्रेस न कर रही हो। हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक विधानसभा चुनावों के वक्त कांग्रेस ने भी महिला सशक्तिकरण और कल्याण योजनाओं की घोषणा करके उसका लाभ उठाया था और सत्तासीन होने में कामयाब रही थी।
देश की अन्य राज्य सरकारों ने भी महिलाओं के पक्ष में समय-समय पर अनेक योजनाएं लागू की हैं, क्योंकि सभी को अब यह अहसास हो चुका हैं कि सत्ता की चाबी केवल पुरूषों की जेब में ही नहीं हैं, महिलाएं भी उसे अपने आंचल से बांधकर रखती हैं। महिलाएं एक कारगर वोट बैंक बन चुकी हैं।

सुशील शुक्ल

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