मनोज कुमार दुबे
जिन्दगी के हक में है सड़क अनुशासन
यों दुर्घटना तो दुर्घटना होती है, लेकिन यह भी सच है कि सड़क अनुशासन अपनाकर हम इंसानी जीवन को काफी हद तक सुरक्षित बना सकते है
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सुबह अखबार खोलिए तो दिल दहल सा जाता है। अखबार के पन्नों पर दिल दुखा देने वाली मार्ग-दुर्घटनाओं और उनसे होने वाली मौतों की खबरें पसरी मिलती हैं। सर्दियों के मौसम में इन खबरों में और भी इजाफा हो जाता है। सड़क हादसों की वजह से असमय काल के गाल में समा जाने वालों में बच्चें, स्त्रियां, युवा और बुजुर्ग सभी शामिल होते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक गये साल यानि 2023 में भारत में कोई एक लाख 73 हजार लोग मार्ग दुर्घटनाओं में मारे गये। इसका मतलब प्रतिदिन औसतन लगभग 474 लोग मार्ग दुर्घटनाओं में जान गंवाते हैं। गौर करने वाली बात यह है कि सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाने, सड़क सुरक्षा के लिए जागरूकता अभियान चलाने के बावजूद हर साल आंकड़ा बढ़ता ही जाता है। यह वृद्धि दर 12 फीसदी सालाना के आसपास आंकी गयी है। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि मार्ग दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाले पैदल यात्रियों की संख्या प्रतिवर्ष 12 प्रतिशत से अधिक की दर से बढ़ती पायी गयी है। विशेषज्ञों का कहना है कि विकसित देशों की तुलना में विकासशील और अविकसित देशों में मार्ग दुर्घटनाएं कहीं अधिक होती देखी गयी हैं। हमारा देश भी उन्हीं में से एक है।
एक्सप्रेस-वे बनने, सड़कों के चैड़ी होने, उनकी स्थिति और उनके रख-रखाव में सुधार होने के बावजूद मार्ग दुर्घटनाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी होना निश्चय ही चिंताजनक है। इसके कारणों पर गौर करें तो एक लंबी फेहरिश्त बन जाएगी। तकनीक में प्रगति के साथ पलक झपकते रफ्तार पकड़ने वाले वाहनों का बाजार में आना, मोटर वाहनों की बेतहाशा बढ़ती संख्या, सड़कों और चैराहों की त्रुटिपूर्ण डिजाइनिंग से लेकर मौसम के उत्पाती तेवर और वाहनों की फिटनेस और ड्राइविंग लाइसेंस जारी करने में व्याप्त भ्रष्टाचार जैसे अनेक कारण गिनाए जा सकते हैं।
सार्वजनिक मार्गों पर बढ़ता मनमाना अतिक्रमण दुर्घटनाओं को बढ़ाने में एक बड़ी भूमिका निभा रहा है। ज्यादातर जगहों पर अतिक्रमण फुटपाथों को निगल चुका है और पैदल चलने वालों की जिंदगी को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। इन सब कारणों से निबटने के लिए तमाम कानून और एजेंसियां हैं, किन्तु वे कितने प्रभावी हैं और यदि प्रभावी नहीं हैं तो क्यों नहीं है, यह शायद किसी खुलासे की दरकार नहीं रखता।
लेकिन यहां हम मार्ग दुर्घटनाओं में वृद्धि के उस कारण पर बात करना चाहेंगे, जिसमें हम नागरिक के तौर पर सीधे-सीधे दखल दे सकते हैं और सड़क हादसों को खत्म तो नहीं, कम जरूर कर सकते हैं। हमें ईमानदारी से स्वीकार करना चाहिए कि हमारे अंदर सड़क अनुशासन का घोर अभाव है। यदि हम सड़क अनुशासन को अपने जीवन में उतार लें तो बहुत सी जिंदगियों को असमय मौत के मुंह में जाने से बचा सकते हैं।
हममें से कितने लोग हैं जो इस बात का ध्यान रखते हैं कि वाहनों को जेबरा क्राॅसिंग पर न रोकें? हम कुछ सौ मीटर की दूरी तय करके यू-टर्न लेने के बजाय धड़ल्ले से उल्टी दिशा में वाहन दौड़ा देते हैं। वाहन चलाते समय फोन पर बात करना तो आम बात है, जबकि सड़क हादसों के लिए यह एक बड़ा कारण बन चुका है। कुछ लोग तो शहर की सड़कों पर हाई बीम में हेडलाइट जलाकर गाड़ी दौड़ाना और सामने से आने वाले को ‘अंधा’ बना देने में अपनी शान समझते हैं। बायीं ओर से ओवरटेक करना लगभग सर्वस्वीकृति प्राप्त कर चुका है। ‘डोंट ड्रिंक एंड ड्राइव’ लिखा है तो लिखा रहे, लोग ड्रिंक भी करते हैं और ड्राइव भी करते हैं, बिना इस बात की परवाह किए कि ऐसा करके वे दूसरों की ही नहीं, खुद अपनी जिन्दगी को भी दांव पर लगा रहे हैं। ‘स्पीड थ्रिल्स’ को तो लोग अपना लेते हैं, मगर ’स्पीड किल्स’ की अनदेखी कर देते हैं। स्टंटबाजी की शौकीन नई पीढ़ी तो जैसे इंसानी जिंदगी को कोई मोल ही नहीं देती। गौर करने जायेंगे तो न जाने कितने ऐसे चलन और ऐसी आदतें जेहन में उभरते जायेंगे। इन कारणों से निबटने का काम क्या केवल पुलिस के भरोसे छोड़ा जा सकता है? क्या एक जिम्मेदार नागरिक के नाते हमारी कोई भूमिका नहीं है?
ईमानदारी से विचार करें तो हम पायेंगे कि अनेक बार हम स्वयं ही मार्ग दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। यों दुर्घटना तो दुर्घटना होती है, लेकिन यह भी सच है कि सड़क अनुशासन अपनाकर हम इंसानी जीवन को काफी हद तक सुरक्षित बना सकते हैं।
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नैतिक पत्रकारिता के कट्टर समर्थक, अपने 20 साल के करियर के दौरान भारत के प्रमुख प्रकाशनों के साथ काम करने के बाद अपना मीडिया हाउस- चौपाल न्यूज़ नेटवर्क शुरू किया।
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