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Apr 02, 2025
मनोज कुमार दुबे

मनोज कुमार दुबे

कहां गई झीलें, कहां गये तालाब

असल बात यह है कि झीलें और तालाब कहां चले गए हैं, इसका पता लगाने के लिए किसी शोध अथवा श्रमसाध्य उपक्रम की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता मात्र इच्छाशक्ति की है। इन्हें मुक्त कराने के लिए जरूर प्रशासनिक दृढ़संकल्प की जरूरत है। और हां, हमें पर्यावरण के प्रति अपनी उत्सवधर्मी चिंता और कर्मकांडीय मानसिकता से भी उबरना होगा।

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एक समय था जब भारत में करीब 24 लाख तालाब हुआ करते थे। हर गांव की अपनी संस्कृति और अपना तालाब होता था। या यूं कहें कि तालाब संस्कृति का ही एक हिस्सा हुआ करते थे। हर तालाब का अपना एक नाम और महत्व होता था। तालाबों के किनारे जंगल या वृक्षों का घेरा होता था। तालाबों का कैचमेंट यानी जलग्रहण क्षेत्र घने जंगलों के बीच होने से भू-कटाव को रोकने में सहायता मिलती थी और तालाब में गाद भी कम जमा होती थी। जिस कारण तालाब हजारों साल तक चलते थे। उस दौरान तालाब, कुंए, पोखर आदि वर्षा जल संचय का सफल माध्यम होते थे। इस पानी को पीने और खेती सहित अन्य कामों में लाया जाता था। साथ ही भूजल स्तर को रिचार्ज करने में इनकी अहम भूमिका रहती थी। लोग जल संचय और जल संरक्षण को भी संस्कृति का ही अहम हिस्सा और जल संरक्षण को हर व्यक्ति अपना कर्तव्य समझता था, लेकिन आधुनिकता की दौड़ में तालाबों की संस्कृति ही खत्म हो गई। जिस कारण देश में केवल सवा दो लाख तालाब बचे और देश का नागरिक बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहा है।
पिछले चालीस-पचास सालों में हमारे देखते-देखते झीलें, तालाब और वर्षा जल संचयन के दीगर छोटे-मोटे साध्य गायब होते गए हैं। हमारी बढ़ती आबादी का दबाव धरती पर कई तरह से भारी पड़ता गया है। आदमी के लिए पानी की आवश्यकता जहां बढ़ी है, वहीं प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता कम होती जा रही है। आदमी ही नहीं, पशु, भू-जल के अभाव का दंश झेल रहे हैं। झीलों और तालाबों की जगह रिहायशी मकान बन गए हैं। कहीं उन्हें समतल करके खेती की जा रही है। यह सब हमारी आंखों के सामने धीरे-धीरे होता गया है और हम प्रकृति के साथ इस बर्बरता की अनदेखी करते हुए पानी की जरूरत के लिए भू-गर्भीय स्त्रोतों पर निर्भर होते गए। चाहे खेती-किसानी के लिए हो, पशुपालन के लिए हो अथवा इंसानी जरूरतों के लिए हो, हमें धरती का गर्भ ही दिखलाई पड़ता है। परिणाम सामने है। धरती के अंदर जल स्तर निरंतर गिरता जा रहा है। कुएं या तो पथरा गए हैं या दलदल में तब्दील हो गए है। हैंड पंप अति अल्पजीवी हो गए हैं। भू-गर्भीय जल का क्षरण हमें ताबाही की ऐसी त्रासदी की ओर ले जा रहा है, जिसकी कल्पना ही भयावह है।
जल की इस भीषण समस्या को देखते हुए कई संगठन जरूर सक्रिय हुए और उन्होंने लोगों को जागरुक करना शुरू किया। नतीजा ये रहा कि देश के कई गांवों में तालाब निर्माण का कार्य शुरू हुआ। कई लोगों/किसानों ने स्वयं के स्तर पर भी तालाबों का निर्माण व सफाई की। सभी के इन प्रयासों से देशभर में हजारों तालाब बनाए जा चुके हैं, लेकिन सरकार की नींद फिर भी नहीं टूटी। सरकार की नींद कुछ माह पूर्व ही टूटी और जलशक्ति मंत्रालय का गठन किया गया। अभी तक तो मंत्रालय के अंतर्गत जल संरक्षण का कार्य जोर-शोर से चल रहा है, लेकिन धरातल पर परिणाम ही मंत्रालय की सफलता की दास्तान को बयां करेंगे।
असल बात यह है कि झीलें और तालाब कहां चले गए हैं, इसका पता लगाने के लिए किसी शोध अथवा श्रमसाध्य उपक्रम की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता मात्र इच्छाशक्ति की है। इन्हें मुक्त कराने के लिए जरूर प्रशासनिक दृढ़संकल्प की जरूरत है। और हां, हमें पर्यावरण के प्रति अपनी उत्सवधर्मी चिंता और कर्मकांडीय मानसिकता से भी उबरना होगा।

उपरोक्त लेख पत्रिका में पेज नंबर 38 पर पढ़ने के लिए क्लिक करें-

मनोज कुमार दुबे

मनोज कुमार दुबे

नैतिक पत्रकारिता के कट्टर समर्थक, अपने 20 साल के करियर के दौरान भारत के प्रमुख प्रकाशनों के साथ काम करने के बाद अपना मीडिया हाउस- चौपाल न्यूज़ नेटवर्क शुरू किया।

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