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Apr 01, 2025
चौपाल न्यूज़ नेटवर्क

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गांवों से पलायन का सच

भारत में बढ़ता शहरीकरण भले ही विकास का आधार हो, लेकिन इसने अनेक समस्याओं को भी जन्म दिया है। बढ़ता शहरीकरण केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के लिये एक बड़ी चुनौती बन रहा है। वर्तमान में दुनिया की कुल आबादी में से 56 फीसदी आबादी शहरों में रहने लगी है। गांवों से शहरों की ओर पलायन हो रहा है। यह प्रवृत्ति जारी रही तो 2050 तक शहरी आबादी अपने वर्तमान आकार से दोगुनी से भी अधिक हो जाएगी।

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भारत को दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थ-व्यवस्था बनाने एवं नया भारत-विकसित भारत बनाने के लिये शहरीकरण पर बल दिया जा रहा है। एक विडम्बनापूर्ण सोच देश के विकास के साथ जुड़ गयी है कि जैसे-जैसे देश विकसित होता जायेगा वैसे-वैसे गांव की संरचना टूटती जायेगी। निश्चित ही जब भी शहरों में कोई नई काॅलोनी विकसित होती है तो हमें यह स्वीकारना ही होगा कि किसी न किसी गांव की कुर्बानी हुई है। एक और विडम्बना एवं त्रासदी है कि जिन्हें शहर कहा जा रहा है वहां अपने संसाधनों से वंचित लोगों की बेतरतीब, बेचैन और विस्थापित भीड़ ही होगी। ऐसा नहीं है कि इस अनियोजित शहरीकरण बढ़ने से हम बेखबर हैं। इसके दुष्प्रभाव हमारे सामने आने लगे हैं। ऐसे में नीति-निर्माताओं को इस समस्या पर गंभीरता से विचार करना होगा। शहरों के विस्तार की बजाय गांवों-कस्बों के विकास पर ध्यान देना होगा। गांव आधारित आर्थिक विकास एवं आर्थिक व्यवस्था को प्रोत्साहन देना होगा। वहां रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतर व्यवस्था करके ग्रामीण आबादी को शहरों की ओर पलायन से रोका जा सकता है। इससे शहरों पर दबाव भी कम होगा और पर्यावरण, स्वास्थ्य, जीवनशैली पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव में भी कुछ हद तक कमी आएगी।
बीते कुछ सालों में गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन करने वाले ग्रामीणजनों की संख्या में निरन्तर बढ़ोत्तरी देखी जा रही हैं। इससे कई प्रकार के असंतुलन भी उत्पन्न हो रहे हैं। शहरों पर आबादी का दबाव बुरी तरह बढ़ रहा हैं, वहीं गांवों में कामगारों की कमी का अनुभव किया जाने लगा हैं। दरअसल, रोजगार और बेहतर अवसरों की तलाश ही इस पलायन के प्रमुख कारण थे और इसी के चलते एक बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी हैं, जिन्हें अस्थायी या मौसमी पलायन करने वालों की श्रेणी में रखा जा सकता हैं। इस मौसमी पलायन के चलते अपना वास स्थल छोड़कर पलायित होने वालों का सही हिसाब रख पाना एक टेढ़ी खीर साबित होता हैं। सरकारी आंकड़ों की बात करें तो साल 1991 से 2001 के बीच के दस सालों में सात करोड़ तीस लाख ग्रामीणों ने पलायन किया था। इनमें से पांच करोड़ तीस लाख लोग एक गांव छोड़कर दूसरे गांवों में बसने के लिए चले गये और करीब दो करोड़ लोगों ने शहरों की ओर रूख किया। इनमें ज्यादा तादाद ऐसे लोगों की थी जिन्हें काम की तलाश थी। एक गांव से दूसरे गांव को पलायन करने वालों की संख्या कुल पलायन का 54.7 फीसदी हैं। सरकारी आंकडे़ यह भी बताते हैं कि 1991 से 2001 के बीच 30 करोड़ 90 हजार लोगों ने अपना निवास स्थान छोड़ा। जो देश की कुल आबादी का 30 प्रतिशत बैठता हैं।
2001-2011 के दशक में किसी प्रांत के भीतर और एक प्रांत से दूसरे प्रांत में पलायन करने वालों की संख्या 09 करोड़ 80 लाख बतलायी गई हैं। इसमें से 06 करोड़ 10 लाख लोगों ने ग्रामीण क्षेत्रों में ही जगह बदली जबकि 03 करोड़ 60 लाख लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर चले गए। यह देखना दिलचस्प होगा कि 1991 से 2001 के दशक में किसी एक प्रांत को छोड़कर दूसरे प्रांत में जाने वालों और बाहर से आकर प्रांत में रहने आने वालों के आंकड़े क्या कहते हैं। लिहाजा इस मामले में महाराष्ट्र अव्वल नम्बर पर ठहरता हैं। महाराष्ट्र से बाहर जाने वालो की अपेक्षा महाराष्ट्र आने वालों की संख्या 20 लाख 30 हजार से अधिक हैं। इसके बाद दिल्ली (10 लाख 70 हजार),गुजरात (68 लाख) और हरियाणा (67 लाख) का नम्बर आता हैं।
उत्तर प्रदेश में जितने लोग बाहर से आये उससे 20 लाख 60 हजार लोग ज्यादा बाहर गये। इसी तरह बिहार से जाने वालों की तादाद बिहार आने वालांे की तादाद से 10 लाख 70 हजार ज्यादा है। जाहिर हैं इस तादाद में लोग पलायन कर रहे हों तो उनकी गिनती या हिसाब रख पाना बड़ा मुश्किल हो जाता हैं।
हालत ये हैं कि भारत सरकार के जनगणना से संबंधित आंकडे भी पलायन की ठीक-ठीक तस्वीर बयां नहीं कर पाते। कोई सरकारी एजेंसी इधर खेतिहर संकट या फिर मौसमी पलायन को पहचानने और दर्ज करने के लिए कागज कलम संभाल रही होती हैं उधर लोग रोपाई-बुआई का समय जानकर या तो दोबारा अपनी जगह पर लौट आ चुके होते हैं या फिर कहीं और जाने की तैयारी में होते हैं। गन्न्ो की खेती ईट-भट्ठा उद्योग में रोजगार के लिए मजदूरों का सामूहिक पलायन एक जानी मानी बात हैं। अगर जीविका के संकट के कारण कोई पलायन करता हैं या फिर मान लें कि मौसमी पलायन ही कर रहा हैं तो इसका असर पलायन करने वाले परिवार के बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता हैं। इन वजहों से ऐसे परिवार के बालिग सदस्य चुनाव के वक्त वोट डालने के अधिकार का प्रयोग नहीं कर पाते। वो चाहें जन्म स्थान पर हों या फिर उस जगह पर जहां रोजगार के लिए जाना पड़ता हैं, गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को जो सुविधाएं मिली हैं वह भी हासिल करने से ऐसे परिवार वंचित रहते हैं। पलायन मौसमी तर्ज पर हो या फिर जीविका के संकट की स्थिति में, गहरी चोट दलितों और अदिवासियों पर पड़ती हैं जो गरीबों के बीच सबसे गरीब की श्रेणी में आते हंै और जिनके पास भौतिक या मानवीय संसाधन नाममात्र के होते हैं। यह बात खास तौर पर से आंध्र प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र के सर्वाधिक पिछड़े और सिंचाई के लिए मुख्यतः वर्षा पर आधारित जिलों पर लागू होती हैं। पलायन की सूरतेहाल मंे महिला का खेतिहर मजदूर के रूप में और पुरूषों का असंगठित क्षेत्र में रोजगार का कोई काम खोजना एक आम बात हैं।
अगर पलायन जीविका के परंपरागत स्त्रोत पर संकट आने के कारण हो रहा हैं तो इससे असंगठिन क्षेत्र में उद्योगों के पनपने को बढावा मिलता है और शहरों में बड़ी बेतरतीबी से झुग्गी बस्तियों का विस्तार होता हैं। छोटी और असंगठित क्षेत्र मंे पनपी फैक्ट्रियों के मालिक पलायन करके आये मजदूरों से खास लगाव रखते हैं। क्योंकि एक तो ऐसे मजदूर कम मेहनताने पर काम करने को तैयार रहते हैं दूसरे छोटी मोटी बातों को आधार बनाकर इनके काम से गैर हाजिर रहने की भी संभावना कम होती हैं। ऐसे मजदूर ठेकेदार के कहने में होते हैं और स्थानीय मजदूरों की तुलना में मोलभाव करने की इनकी ताकत भी कम होती हैं। मजदूरों की यह कमजोरी और कम मेहनताना भले ही कुछ समय के लिए उद्योगों के फारदे में ही लेकिन आगे चलकर देश की बढ़ोतरी की कथा में ऐसे मजदूरों की भागीदारी नहीं हो पाती। क्योंकि उनके पास खरीदने की ताकत भी कम होती हैं और इसीलिए उपभोग की ताकत भी कम। जबकि बाजार बढ़ते हुए उपभोग से ही बढ़ता हैं। इसी कारण अक्सर यह तर्क दिया जाया हैं कि गांवों से शहरों की तरफ पलायन तभी समृद्धि की राह खोज सकता हैं जब मजदूरों के लिए ज्यादा मेहनताना पाने का आकर्षण हो और दूसरी तरफ गांवों से खदेड़ने वाली गरीबी हो, सच यह कि यह सब बेमानी ही साबित हो रहे हैं। कुछ विशेषज्ञ यह मानते हैं कि पलायन करने वालों की वास्तविक संख्या आधिकारिक संख्या से 10 गुना ज्यादा हो तो कोई ताज्जुब नहीं।

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