मनोज कुमार दुबे
बच्चों को बचाना होगा
स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने आज के समाज को खासतौर पर बच्चों को अकेला कर दिया हैं। वे जीवन की अर्थवत्ता आभासी दुनिया में खोजने लगते हैं जो दरअसल कोई दुनिया है ही नहीं, बस एक छलावा भर है। इस छलावे से बच्चों को बचाना ही होगा ताकि वे स्वस्थ-संतुलित और सक्षम जीवन जी सकें, जिसके वे हकदार हैं।
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‘‘कर लो दुनिया मुट्ठी में।‘‘ कभी सब जगह नजर आने वाली रिलायन्स की यह मार्केटिंग टैगलाइल याद है? मोबाइल फोन को सर्वसुलभ बनाने की इस रणनीति ने संचार क्रांति के सागर मंे जैसे ज्वार ला दिया था। तकनीक की नित नयी छलांगों के साथ मोबाइल फोन अब स्मार्ट बन गया है जिसके मायाजाल ने हमारे जीवन को पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया हैं। इंटरनेट ने बेशक कई मायनों में हमारे जीवन को सुगम बनाया है, लेकिन उसने हमारे जीवन से धीरे-धीरे बहुत कुछ छीन भी लिया है। निरंकुश सोशल मीडिया ने मानवता के सामने गंभीर चुनौतियां भी खड़ी कर दी हैं।
आज बच्चे, युवा, स्त्रियां, बुजुर्ग सभी सोशल मीडिया की गिरफ्त में आकर वास्तविक जीवन से दूर होते जा रहे हैं और आभासी दुनिया को ही वास्तविक दुनिया मानने की ओर बढ़ते चले जा रहे हैं। हालत यह है कि परिवार नाम की संस्था का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया हैं। दुनिया भर में समाजशास्त्री सोशाल मीडिया के दुष्प्रभावों पर चिंता व्यक्त कर रहें हैं, लेकिन इन दुष्प्रभावों से बचने की दिशा में कहीं कोई ठोस कदम उठाये जा रहे हैं, ऐसा नहीं लगता।
ऐसे में आस्ट्रेलिया ने जो पहल की हैं, उसकी सराहना की जानी चाहिए। अभी हाल में वहां की सरकार ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों और किशोरों के लिए सोशल मीडिया को प्रतिबंधित करने के लिए कानून बनाया हैं। अच्छी बात यह हैं कि आस्ट्रलिया की संसद में मुख्य विपक्षी दल के सांसदों ने भी इस कानून का समर्थन कर इसे पारित करवाया हैं। इस कानून के अधीन सोशल मीडिया कंपनियों को आदेश दिया गया हैं कि वे बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने के लिए प्रभावी उपाय करें। यदि वे ऐसा नहीं करती तो उन पर तीन करोड़ डाॅलर से अधिक तक का जुर्माना लगाया जा सकता हैं। यह कानून अपने उद्देश्य में कितना सफल होगा यह भविष्य में ही पता चलेगा। यह भी सही है कि इस कानून को अमली जामा पहनाना दुश्वारियो सें भरा होगा। लेकिन दुश्वारियों के डर से पहला कदम ही न उठाने को बुद्धिमता तो नहीं कहा जा सकता। आस्ट्रलिया ने पहला कदम उठाकर एक राह खोली हैं और देर-सबेर भारत सहित अन्य देशों को भी इस बारे में सोचना ही होगा।
अमेरिका के एक समाज-मनोविज्ञानी ने अपने शोध से यह निष्कर्ष निकाला है कि सन् 2010 से 2020 के बीच वहां कालेज के छात्रों के बीच चिंता और अवसाद से ग्रस्त होने वालों की संख्या में सौ प्रतिशत से भी अधिक का इजाफा हुआ। भारत में ऐसा कोई शोध या ऐसे कोई आंकड़ों तो सामने नहीं आये हैं लेकिन छात्रों द्वारा तनाव, अवसाद और असफलता के भय के कारण आत्महत्या की खबरें आये दिन सामने जरूर आती हैं। इसके लिए प्रत्यक्ष रूप से न सही तो परोक्ष रूप से सोशल मीडिया को कारण अवश्य माना जा सकता हैं। क्योंकि यह वही पीढ़ी है जो सोशल मीडिया के मकड़जाल से गुजरते हुए युवा हुई हैं और हो रही हैं।
जाहिर है कि बच्चों को सोशल मीडिया के कुप्रभावों से बचाना बहुत जरूरी हैं। इसके लिए पहली जिम्मेदारी अभिभावकों की बनती हैं, लेकिन उन अभिभावकों से क्या उम्मीद की जाये जो बच्चों के सवालों से और अपने बचपन में अभिभावकों की भागीदारी की मांग से बचने के लिए खुद ही बच्चों को मोबाइल के नशे का आदी बना देते हैं। बच्चे स्वभाव से उत्सुक होते हैं और आनन्द की तलाश में रहते हैं। सोशल मीडिया उनकी इस ‘भूख‘ को आसानी से न केवल शांत करता हैं बल्कि उसे बढ़ावा भी देता हैं। वे बाहरी या वास्तविक दुनिया से कट जाते हैं और आत्मकेन्द्रित होते जाते हैं। वास्तविक जीवन की चुनौतियाँ उन्हें दुरूह लगने लगती हैं, जिसके कारण वे असुरक्षा की भावना का शिकार हो जाते हैं। अन्ततः इस सबकी परिणति तनाव, अवसाद, अकेलेपन और कुंठा में होती हैं।
यह मानना भूल होगी कि खेल के मैदान में जाकर बच्चे सिर्फ खेलने का आनन्द उठाते हैं। खेल के मैदान में जाकर वे हार-जीत को पचाना सीखते हैं, लड़ते-झगड़ते हैं लेकिन अपने विवादों और अपने संबंधों में आने वाली समस्याओं को परस्पर बातचीत और समझौतों द्वारा सुलझाने की कला भी सीखते हैं। वे अपनी भावनाओं समस्याओं और शंकाओं को साथियों के साथ साझा करते हैं और उनमें टीम भावना विकसित होती हैं। खेल का मैदान उन्हें चुनौतियों से दो-चार होने और जीवन के प्रति संतुलित दृष्टिकोण विकसित करने की सीख देता हैं। स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने उनसे यह सुविधा छीन ली है और उन्हें अकेला कर दिया हैं। वे जीवन की अर्थवत्ता आभासी दुनिया में खोजने लगते हैं जो दरअसल कोई दुनिया है ही नहीं, बस एक छलावा भर है। इस छलावे से बच्चों को बचाना ही होगा ताकि वे स्वस्थ-संतुलित और सक्षम जीवन जी सकें, जिसके वे हकदार हैं।
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